Thursday, 10 March 2016

हर मुश्किल का अचूक समाधान - हिर्दय पर ध्यान

अगर हम खुश है, जीवन में सब कुछ ठीक चल रहा है तो हम ध्यान क्यूं करें? या मैं इतना व्यस्त हूं कि मेरे पास ध्यान करने का समय ही नहीं है। और कुछ लोग ध्यान करने के प्रस्ताव को यह कह कर भी टाल देते है कि आखें बन्द कर के बैठने से क्या होगा? ऐसी प्रतिक्रियाएं हमें अक्सर सुनने को मिल जाती है जब हम अपने भाई-बन्धुओं के आगे ध्यान का अनुभव करने का प्रस्ताव रखते है। पर्ंतु किसी चीज को संम्पूणता परखे बिना ही निर्णय लेने से हम अपने ही विकास में स्वं बाधा उत्पन्न कर लेते हैं।

सत्य तो यह है कि यह बातें हम केवल तभी कह सकते हैं जब हम ध्यान नहीं करते या फिर जो तत्परता व तैयारी ध्यान के लिये चाहिये वह उसे अर्पित नहीं करते। ओर परिणामस्वरूप यह समझ ही नहीं पाते कि आज के आधुनिक व्यस्त जीवन की जटिल से जटिल समस्याओं के लिये ध्यान सबसे अमोघ व सर्वश्रेष्ठ समाधान है। जब हार्टफुलनेस पद्द्ति के अनुसार हम हिर्दय में मौजूद दिव्य प्रेम के प्रकाश पर ध्यान करते हैं तो वह हमारे जीवन की सर्वकूंजी [master key] बन कर हर बाधा का सर्वोत्त्म हल प्रकाशित करने लगता है।  

आज के हालात में व्याप्त कोलाहल तथा अव्यवस्था में हमारे कर्मों व विचारों का बहुत बड़ा हाथ है। अपने दूषित विचारों और कर्मों के फलस्वरूप हम अपना विवेक ओर सही बात पहचानने की बुद्धी नष्ट कर लेते हैं। यह हमी हैं जिन्होने अपने गलत ओर दूषित विचारों के ताने-बाने से एक जाल बुन कर अपनी आत्मा पर आवरण बना लिए हैं जिससे हम अपनी आत्मा में झाँक भी नहीं पाते। और हमने खुद को ईश्वर परिधी से बहुत दूर, माया के अंधकार में ढकेल दिया है। हम यह सत्य भूल गये हैं कि ‘हमेंशा वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है।’ कठिनाई तब उत्पन्न होती है, जब हम यह मानने लगते है कि यह हमारे प्रयत्नों के फलस्वरूप हो रहा है। जो हमें बन्धन में डाले रखती है। इस अहममय भावना की समाप्ति ही सशक्त जीवन का प्रारम्भ है। अत: जब मनुष्य की आँख अपनी भीतरी उच्चतर स्वकी और मुड़ती है, तब वह ईश्वर की महान शक्ति से जुड़ जाता है और अपने निम्नतर स्वको भूलने लगता है और तभी वह असली मानव बनता है

सहजमार्ग पद्द्ति में हिर्दय पर किया जाने वाल ध्यान हिर्दय से मलिनता को हटाने और आध्यात्मिक मार्ग की बाधाओं को दूर करने का सबसे सरल तरीका है। यहां ध्यान में हम जहां दिल की धड़कन सुनायी देती है उस बिन्दु पर ध्यान करते है। हम अपने को एक बिन्दु पर एकत्र करते हैं, जिससे कि हमारा व्यक्तिगत मन अपनी इधर-उधर भटकने वाली आदत को, जो इसने डाल रखी है छोड़ दे। सहज मार्ग प्रकृति के साथ चलता है। इसके अभ्यास से हम अपने व्यष्टी मन को प्रकृति के अनुरूप सही मार्ग पर ला देते हैं। सहज मार्ग की शिक्षा एवं अभ्यास का प्रत्येक अंग प्रकृति से तलमेल रखता है। जैसे जैसे हम इस साधना पद्द्ति का अभ्यास करने लगते है हम अपने अंदर व्यापक परिवर्तन प्रकट होता पाते हैं। हम यह महसूस कर पाते हैं कि जो पूर्णता हमें प्रक़ृति में दिखती है वह हममें भी हो रही है। 
सहज मार्ग पद्द्ति में हमें यह विचार ले कर कि हिर्दय की गहराइयों में दिव्य प्रकाश का स्त्रोत है जो हमें भीतर अपनी और आकर्षित कर रहा हैध्यान करने की सलाह दी जाती है। हमें प्रकाश का केवल सुझाव मात्र लेकर चलने को कहा जाता है। उस चमकहीन हल्के प्रकाश के मूल में देवत्व का विचार निहित होता है। हम कह सकते हैं कि एक तरह से सहज मार्ग की ध्यान की प्रक्रिया हमें अपने असली घरकी याद दिलाती है। जहां से हम आये हैं और यह हमारा काम है कि हम उस जगह पहुंचे जहाँ के हम हैं। जब हम सहज मार्ग पद्द्ति के अनुसार ध्यान करना आरम्भ करते है तो हम अपने हिर्दय में मौजूद दिव्यता से जुड़ने लगते हैं, तब अपने असली घर की याद हममें जोर पकड़ती जाती है। और इस तरह  ध्यान के नियमित अभ्यास से हमारा परिचय असलियत से जुड़ी श्रेष्ठ्तर चीज से हो जाता है, तब इस दुनिया कि बाहरी वस्तुओं में हमें आकर्षित करने की, हमें गुलाम बनाने की, हमें बन्धन में रखने के शक्ति नहीं रह जाती। 
सहज मार्ग का हिर्दय पर ध्यान एक तरह से धनुष-बाण की कला सीखने जैसा है। जिसका हम जितना अधिक अभ्यास करते है उतनी अधिक ऋजुता व सटीकता के साथ कार्य करने लगते हैं। हार्ट्फुलनेस की खास विशेषता जो सहज मार्ग को अद्वितिय बनाती है वह है प्राणाहुती। यह निराली योगिक ट्रांसमिशन ही ध्यान को सही मायने में क्रियाशील बनाती है। हार्टफुलनेस पद्द्ति के अंतगर्त जब हम हर रोज एक वीर धनुर्धर की भांति प्रेम व भक्ति के बल से हिर्दय की कमान पर हमारे हिर्दय में दिव्य प्रकाश मौजूद है जैसे पवित्र, हल्के व अतिसूक्ष्म विचार की प्रत्यंचा बांध कर लक्ष्य साधने का प्रयास करते है तो सहज मार्ग की अद्वितिय खासियत प्राणाहुतीहमारे हिर्दय में संचारित होने लगती है। प्राणाहुती का अचूक बाण ध्यान के लक्ष्य को बांधने में हमारी सहायता करता हैं। वास्तव में प्राणाहुती एक नोदक [propeller] की भांति कार्य करती है वह हमारे हिर्दय में दिव्य प्रकाश हैके विचार को भावना व दिव्य अहसास में परिवर्तित कर देती है। अत: उस अतिसूक्ष्म दिव्य प्रकाश के अहसास की नीरवता’ [silence] में धनुर्धर व लक्ष्य दोनों एक होने लगते हैं। तथा हमारे हिर्दय में अपने सिरजनहार के साथ एक हो जाने की स्वभाविक तड़प उत्त्पन होने लगती है। जो हमें ध्यान के अगले पड़ाव की ओर ले जाती है; हम यह अहसास कर पाते हैं कि हमारे हिर्दय में दिव्य प्रकाश का संम्पूर्ण स्त्रोत मौजूद है; और उस गहन आन्तरिक संवेदना से एकत्व भाव उजागर होने लगता है कि यह दिव्यता का स्त्रोत तो हर हिर्दय में मौजूद है।

हर्टफुलनेस विधी की योगिक प्राणाहुती द्वारा हिर्दय में प्रेम व भक्ति का आत्मिक भाव उत्पन्न होते ही हम अनात्मिय विचारों की सुध लेना भूल जाते है ओर हमारे सभी विचार धीरे-धीरे थम कर स्वत: ही लुप्त हो जाते हैं। विचारों में शक्ति इसलिये होती है क्योंकी हम उनकी और ध्यान देते हैं। जहां हमारा ध्यान नहीं होता, वहां दूसरी वस्तु का भी कोई पारस्परिक प्रभाव नहीं होता। अत: जब प्रेम व भक्ति से भरी हमारी निगाह अपने लक्ष्य पर होती है तो हर अन्य चीज अपने आप छूटने लगती है।

हार्टफुलनेस पद्द्ति में ध्यान के लिये हम हिर्दय को इसलिये लेते हैं क्योंकी हिर्दय ही वह पंम्पिग स्टेशन है जो सारे शरीर में रक्त पहुँचाने का काम करता है, वह रक्त शुद्ध करने के उपरान्त उसे शरीर की सभी कोशिकाऔं तक पहुँचाता है। जब हम नियमित रूप से हिर्दय को ध्यान का केन्द्र बनाते हैं तो वहां मौजूद दिव्यता हमें छूने लगती है, अपनी गहराइयों से संपर्क जुड़ते ही हमारा हिर्दय दिव्य होने लगता है। और जब हमारे शरीर में परिभ्रमण करने वाला रक्त सर्वप्रथम उस निर्मल पावन हिर्दय से गुजरता है  तो हमारा संम्पूर्ण शरीर भी उस पवित्रता से प्रभावित होने लगता है। जिससे हमारे विचारों ओर कर्मों से बनी ठोसता पिघलने लगती है। और हम शरीरिक, भवनात्मक व आध्यात्मिक सामंजस्यता की ओर अग्रसर होने लगते हैं। इसके अलावा हिर्दय भावनाओं का वास स्थान है और केवल वहीं हम प्रेम व भक्ति का वह भाव पैदा कर पाते हैं जो हमारी आत्मा को परमात्मा से जोड़ देता है; हिर्दय ही एकमात्र ऐसा बिन्दु है जिस पर जड़-चेतन को जोड़ने वाली कड़ी की स्पष्ट अनुभूती होती है। इसके साथ साथ यह हमारा हिर्दय ही है जो हमें सारी कायनात से जोड़े रखता है अत: वहां ध्यान करने से एकत्व भाव बड़ी आसानी से उत्पन्न होने लगता है। 
ध्यान की वह निर्मल विश्राम की अवस्थाभूलोक में समय-व्यर्थ करने जैसी लगती है, परंतु वास्तव में वही हमारे श्रेष्ठतम उत्थान का गड़ है। सहज मार्ग की विधी अनुसार जब हम ध्यान का अभ्यास करते है तो हम अकसर ध्यानमग्न विराम के लम्हों में अनंतता के सागर में प्रवास करने लगते है। प्राणाहुती की सहायता से हम विकास के उन उच्चतम आयमों पर पहुँच जाते हैं जहाँ हम आजीवन घोर परिश्रम करते रह कर भी पहुँच हासिल नहीं कर सकते। हमारी आत्मा के सश्क्त होते ही हमारी सीमित बौधिक क्षमता को हमारी अथाह हार्दिक क्षमता का आधार मिलने लगता है। चेतना के उच्च्तम आयाम हमारी दृष्टीकोण व सोच को प्रभावित करने लगते हैं तब हम हर कार्य ठीक वैसे करने लगते हैं जैसे होना चाहिये श्रेष्ठ्ता की परम परिकाष्ठा तक श्रेष्ठ, जिसमें सृष्टी के हर जीव का समुचित विकास निहित होता है।      

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Footnotes:

(1) CWRC - V-I, (First Edition) CH-Dhyaan from Rajyog ka Divya Darshan at pg. 107 & Ch-Dhyaan from Sahaj Marg Darshan at pg. 289-290 (www.sahajmarg.org)

(2) Sahaj Marg ke Sidhaant V-II, (First Edition) CH-"Sahaj Marg Ki Kho0bsurti"- pg 76 to 80 (www.sahajmarg.org)

(3) Heartfulness Magazine Ch-Transmission (The science of Spirituality) at pg. 47, by Rev. Kemelsh D Patel (www.heartfulnessmagazine.com

(4) Radio City Smaran - Dil ki Awaaz Part-II By Rev. Kemelsh D Patel  (www.heartfulness.org