Thursday, 10 March 2016

वह सब जो सहज है सुन्दर है।

जब किसी व्यक्ति को घर के लिये आवशयक सामान खरीदने हेतु बाजार जाना होता है तो बुद्दिमत्ता यही कहती है कि उसे खरिदारी के लिये निकलने से पहले उसकी जेब में कितने पैसे है इसकी जांच आवश्य कर लेनी चाहिये। और बहुता वह पाता है कि जितना सामान उसे खरीदना है उतना प्रयाप्त धन उसकी जेब में नहीं है, अत: वह पहले ATM जाता है और जितना चाहिये उतना धन निकाल लेता है। ताकी जिस काम के लिये वह निकला है उसे वह सही ढ़ग से पूरा कर सके। परंतु अगर वह बाजार जाने से पहले यह सोचता है कि अगर वह ATM गया तो उसका एक घंटा बरबाद हो जायेगा और वह अपनी आर्थिक क्षमता की परवाह किये बिना ही खरीदारी करने निकल पड़ता है तो निश्चित ही बाजार जाने पर उसका धन जल्द ही समाप्त हो जाता है और उसे पूरी खरीदारी किये बिना ही वापिस लौटना पड़ता है। ओर इस तरह समय, धन, व अन्य क्षमतायें उप्लब्ध होने के बावजूद भी सही व्यव्स्था के अभाव के कारण हमारे जीवन में असहजता उत्पन्न होने लगती है

अगर हर दिन की शुरूवात हम हिर्दय पर ध्यान करने से करें तो निश्चित ही हम अपने अनमोल मानव जीवन का जैसा सदुपयोग करना चाहिये ठीक वैसा ही करेंगे। उपरोक्त दृष्टांन्त के अनुसार हार्टफुलनेस का ध्यान भी एक तरह से हमारे जीवन में ATM की भूमिका निभा कर उसमे सहजता का विस्तार करता है। हार्टफुलनेस पद्द्ति में हिर्दय पर ध्यान करने के दौरान हममें जो प्राणाहुती प्रवाहित होती है। वही हमारी आत्मा का भोजन है। वह हमारी आत्मा को सशक्त करती है। हमारी आत्मा हमारे शरीर व मन का मूल है। जैसा की हम सभी जानते है कि वृक्ष का बाहरी विकास पूर्ण रूप से उसके मूल के विकास पर ही निर्भर करता है। वृक्ष की जड़े अगर मजबूत हो जाये तो वह वृक्ष उच्चतम सीमा तक सहजता से स्वत: ही विकसित होने लगता हैं। अत: जब हम सर्वप्रथम अपनी आत्मा की जरूरत पूरी कर लेते है। यानी रोज हार्ट्फुलनेस का नियमित अभ्यास करते हुये अपनी आत्मा को प्राणाहुती का जल प्रदान कर उसकी प्यास बुझाते है तो हमारी आत्मा बलशाली होने लगती है। तब हमारी आत्मा जो परमात्मा का अंश है। हमारे मन व शरीर का इस प्रकार नियमन करने लगती है कि हमारे जीवन में एक खूबसूरत प्राकृतिक तालमेल स्थापित होने लगता है। हम न्युनतम श्रम में अधिक्तम निर्माण करना सीखने लगते हैं। तब हमारे आचार, व्यव्हार, व भाषा जैसी हर चीज में सादगी व सहजता परिलक्षित होने लगती है।

जिस प्रकार प्रकृति सुव्यवस्थित है। प्रकृति में कोई भी अनावश्यक चीज नहीं है। प्रकृति की हर अभिव्यक्ति ठीक तभी होती है जब वह होनी चाहिये। जिस प्रकार प्राकृति के कार्यकलाप में जिसे हम “प्रयास” कहते हैं उसकी अवश्यकता नहीं होती। वह नितांत सादगी से अपना काम करती है। ठीक उसी प्रकार से सहज मार्ग पद्द्ति जो शिक्षा और अभ्यासक्रम हमें प्रदान करती है, उसमें भी हम वही सादगी महसूस कर पाते हैं। हम देख पाते है कि इसका नियमित अभ्यास बड़े स्वभाविक ढंग से हमारे आस्तित्व के मूल अधार तत्वो को ही परिवर्तित कर देता है। तब हमें सभी क्रियाएँ बिना किसी प्रयास के होती हुयी प्रतीत होती हैं। यहां तक के हमसे चरम त्याग भी सहजता से, बिना परिश्रम के, बिना तनाव या तकलीफ के हो जाता है। यहां सब स्वभाविक रुप से उभरता है जब आवशक हो, जब उप्युक्त हो। अत: जब हम सहज मार्ग साधना में आगे बड़ते हैं तो हमारे जीवन के अनुभव यह रहास्य उजागर करने लगते है कि सच्चा सौन्दर्य व सच्चा आन्नद केवल सहजता में ही होता है। हम महसूस कर पाते है कि वह सब जो सहज है सुन्दर है।      

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Footnotes: 
Sahaj Marg ke Sidhaant V-II, (First Edition) CH-"Sahaj Marg Ki Kho0bsurti"
pg 76 to 80 - from Sahaj Marg Hindi Literature