माईकेल
मिकेनए के अनुसार, “हमारी
समझ ही अक्सर रूकावट बन जाती है –
‘वह देखने में’, जिसे देखने की हमें जरूरत होती है।” यह
वाक्यांश जीवन के अति महत्वपूर्ण सत्य को जाहिर करता है कि हम मानव अपने जीवन के
सर्वोच्च विकास में बाधायें स्वयं ही उत्पन्न करते रहते है। जिन चीजों से हम दूर
भागते हैं केवल वही हमें “वहां” ले जा सकती है जिसकी हमें सबसे अधिक जरूरत होती है। मिसाल के तौर पर हम
जीवन में अधिकतर अनुशासन, संयम, नियम, व संतुलन जैसी चीजों को नापसंद करते हैं। हमें लगता है कि वह हमारी
स्वतंत्रता में एक तरह का प्रतिबंधन हैं। अगर हम समझने का प्रयास करें कि जीवन में स्वतंत्रता वास्तव
में क्या है; मुक्ती या बन्धन? तो हम पायेंगे कि
स्वतंत्रता हमें अधिकतर अधोमुखी दिशा में बहा कर ले जाती है। स्वतंत्रता मिलने पर
हम अक्सर वह करने लगते है जो हमें नहीं करना चाहिये। जैसेकि स्वतंत्रता मिलते ही
हम अन्य वस्तुओं पर अपना अधिकार जमाने लगते हैं, या जो उपलब्ध है उनका
दुरूपयोग करने लगते हैं। ततपश्चात हम उन वस्तुओं व परिस्थितियों के गुलाम बन जाते
हैं, उनके
बिना हमें जीवन जीना कठिन लगने लगता है। अतत: हम महसूस कर पाते हैं, कि स्वतंत्रता वास्तव में
स्वतंत्रता नहीं बाध्यता है क्योंकि वह हमें निम्न स्तर से बांधे रखती है।
कथाउपनिषद (2:6) में यमराज नचिकेता से कहते है कि, “अपने
जीवन में उपलब्ध संपन्नताओं से मोहित हो कर मूर्ख व्यक्ति मृत्यु के बाद क्या होगा
इस बारे में कभी नहीं सोचते; वह इस विश्वास में जीते है कि इस संसार के अलावा अन्य कोई संसार है ही
नहीं। अत: वह बार बार जन्म-मरण के मेरे इस जाल में आ गिरते है।” इस उल्लेख पर अगर हम
अंर्तविलोकन करें तो पायेगें कि मानव की स्वतंत्रता से जीने की आदत ही उसे निरन्तर
बन्धन में बांधे रखती है। और दूसरी तरफ अगर हम देखे तो पाते हैं कि स्वतंत्रता का
पर्यायवाची स्वावलंम्बन व स्वशासन भी होता है। स्वतंत्रता के इन श्रेष्ठतर अर्थों को हम अपने जीवन में तब अपनाते हैं जब हमारे हिर्दय में
अपने उत्थान की अभिलाषा जागृत हो जाती है।
एंड्रूस
जूली के यह शब्द कि, “कुछ लोग अनुशासन को उबाऊ समझते है; मेरे लिये यह एक तरह की
सुव्यवस्था है जो मुझे उड़ने के लिये तैयार करती है”। तथा ऎच
ऎ डोर्फमैंन के अनुसार, “आत्मानुशासन एक तरह की आजादी है: आलस्य व मन्दता से आजादी, दूसरों से किसी भी तरह की अपेक्षा या चाह से आजादी, अपनी दुर्बलताओं, भय व शंकाओं से आजादी; आत्मानुशासन से, एक प्रबुद्ध व्यक्ति अपनी अंदरूनी शक्ति व क्षमताओं से तादात्म्य स्थापित
कर पाता है। जिससे वह अपने विचारों व भावनाओं का गुलाम न रह कर उन्हें काबू में
रखते हुये उनका मालिक बन जाता है।” यह वक्त्तव्य इस बात की आदर्श जीवंत मिसालें है कि अनुशासन ही हमें
वास्तविक स्वतंत्रता की और ले जाता है। अतएव हमें यह समझना होगा कि स्वतंत्रता के
सही मायने क्या हैं? और हमें इसका प्रयोग कैसे करना चाहिये? यह
मुल्यांकन केवल इस बात पर निर्भर करता है कि हम मानव जीवन को कितना मूल्यवान समझते
हैं।
अन्नापूर्णनाउपनिषद (1:40)
के अनुसार जब हम स्वयं से यह प्रश्न पूछने लगते है कि, “मैं कौन हूं? यह सृष्टी कैसे बनी? इसके होने का क्या कारण है? जन्म और मृत्यु क्युं होते हैं।, इन प्रश्नों के उतर की
तलाश हमें मानव जीवन के सर्वोत्त्तम लक्ष्य की प्राप्ति की ओर (यानी हिर्दय पर
ध्यान द्वारा ‘स्वयं या ईश्वर से साक्षात्कार’ के मार्ग पर) ले जाती है।” यह सर्वोच्च विकास की अद्वतिय राह शाशवत परमान्नद की प्राप्ति की राह है।
ओर जब हम मानव जीवन के इस सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त करने का दृड़ निश्चय कर लेते
है तो उच्चतम ऊँचाईयों पर पहुँचने के लिये तथा राह में आने वाली कठिनाईयों से
झूझने के लिये अपने जीवन में अनुशासन व व्यवस्था को लागु करते हैं। ताकि हम अपने
मन व इन्द्रियों का नियमन (regulation) कर सकें। ताकि वह सब विधिवत कार्य करें जिससे कि हम अपने अनमोल मानव जीवन
जो हमें एक निश्चित सीमा के लिये मिला है उसका सर्वोत्त्म उपयोग करते हुये
सर्वाधिक लाभ उठा सकें ।
स्वशासन
अथवा अनुशासन से क्या लाभ है? उसका मानव जीवन में क्या
महत्व है। ऎल्बर्ट हब्बार्ड के शब्दों में, “अनुशासन वह कौशल है जिसमें आप केवल वही करते है जो आपको करना चाहिये, और तभी, जब करना चाहिये; चाहे उस काम को करने का
आपका मन हो या ना हो।” ज़िम रोह्न कहते है कि, “अनुशासन, लक्ष्य और उपलब्धि के बीच
का सेतु है; अपने जीवन में कारगार परिवर्तन लाने के
लिये आपको अपने जीवन में ज्यादा कुछ नहीं बदलना पड़ता; सिर्फ थोड़ी सी सहज
व्यवस्था आपके जीवन पर कैसा बेहतरीन असर छोड़ सकती है यह आप केवल 90 दिनों में ही
जान लेते हैं। उसके लिये आपको बारह महीने या तीन साल तक इन्तजार नहीं करना पड़ता।” अनुशासन जीवन के
मिथ्याजाल (illusion) से वास्तविकता (reality) तक के मध्य की दूरी तय
करने में स्थिरक (stabilizer) का कार्य करता है।
जिससे हम हमारे जीवन की जटिलताओं व दुर्बलताओं पर नियंत्रण कर पाने के साथ साथ
बेहतर संचालन भी कर पाते हैं। दूसरे शब्दों में अनुशासन एक ऐसा प्रक्रम है जिसमें
हम जीवन की फसल से सारी खरपतवार (weeds) निरन्तर निकालते रहते है
ताकि हमारा जीवन सही मायने में फ़लवान व कामयाब हो सके।
अनुशासन
केवल क्रमागत उन्नति (evolution) व विकास के लिये ही
आवश्यक नहीं होता परन्तु जो उत्कृष्ट अवस्था हमने प्राप्त कर ली है उसे बनाये रखने
के लिये भी उसकी उतनी ही जरूरत पड़ती है। जैसाकि हम देखते है कि हर कलाकार अपनी कला
को संजोये रखने के लिये उसका नियमित रियास आवश्य करता है। अत: जब मानव विवेकशीलता
के साथ वही कार्य बारंबार करता रहता हैं जो उत्तम है तो समय के साथ वह कार्य उसकी
आदत व स्वभाव में तब्दील हो जाता है। एक तरह से अनुशासन
के ज़रिये हम स्वयं को उत्कृष्ट मानव बनने के सांचे में ढालने का कार्य करते हैं। जैसाकि अरस्तु ने कहा है, “उत्कृष्टता कोई कार्य
नहीं बल्कि एक आदत है। हम इस लिये सही कार्य नहीं करते कि हमारे अन्दर अच्छाई या
उत्क़ृष्टता है, बल्कि वो हमारे अन्दर इसलिये है क्योंकि हमने सही कार्य किया है। हम वो है
जो हम बार बार करते है; उत्कृष्टता वो कला है जो एक कार्य नहीं बल्कि प्रशिक्षण व आदत से आती है।” अंतत: हम कह सकते है कि अनुशासन वह इंजन है जो
हमारे अनमोल मानव जीवन की गाड़ी में अगर जुड़ जाये तो वह हमें “जो हम हैं” से “हमें जो होना चाहिये” तक की उर्द्वमुखी अन्नत
उड़ान की ओर ले जाता है।
बृहदारण्यकोपनिषद की
मानव उत्थान की यह प्रार्थना, “असतो मा सदगमय।, तमसो मा ज्योतिर्गमय।, मृत्योर्मामृतं गमय।” इस नश्वर जीवन से संम्बंधित किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिये प्रार्थना
नहीं है बल्कि इस प्रार्थना में हम अपने ईश्वर, अपने ईष्ट से कह रहे है
कि, “हे ईश्वर मुझे कुमार्ग से सन्मार्ग की और ले चलो।, अज्ञान रूपी अन्धकार से
ज्ञानरूपी प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।” यह उर्द्वमुखी प्रार्थना का भाव मानव के हिर्दय में तभी उत्पन्न होता है
जब जीवन के विभिन्न पाठों को सीख कर वह परिपक्व हो जाता है, जब उसे ईश्वर की आपार
दिव्य शक्ति व अपनी दुर्बल भ्रामक अवस्था का अभास हो जाता है। जब वह जीवन के
विभिन्न अनुभवों से यह सीख जाता है कि यह नश्वर संसार कर्मों के निराले नियमों के अनुसार चलता है तथा प्राकृति
के इन अनभिज्ञ नियमों को समझ पाना मानव के बस की बात नहीं है। अत: मानव हिर्दय में जन्म-मरण के चक्र के इस पीड़ादायक बंन्धन से सदा के
लिये मुक्ती प्राप्त करने की तीव्र इच्छा उत्पन्न होने लगती है तब मानव हिर्दय
मृत्यु से अमरता की ओर जाने की राह ढूंढने लगता है, और वह ईश्वर से तब तक यह
प्रार्थना करता ही रहता है जब तक कि उसे “इसी जन्म
में ईश्वर प्राप्त करने का” सहज मार्ग (www.sahajmarg.org) जैसा अचूक मार्ग न मिल जाये।
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