हार्ट्फुल्नेस
ध्यान के दौरान हर रोज जब हम अपने हिर्दय की गहराइयों के एकांतवास में विलीन होने
का प्रयास करते हुये “अपने अंन्त:करण के आलोक से”, एक अटूट सम्बन्ध स्थापित करते हैं, तो वह
दिव्य-आलोक, वह दिव्य-प्रकाश हमारी सोच व कार्यों को
परिष्कृत कर देता है; जिससे हमारा जीवन से उत्कृष्ट
तालमेल (fine-tuning) स्थापित होता जाता है।
हार्टफुल्नेस ध्यान की प्रक्रिया में हम अपने विचार को विस्मय व श्रद्धा के साथ ‘एक विषय-वस्तु पर’ टिकाने का प्रयास करते हैं। कि “हमारे हिर्दय में दिव्य प्रकाश मौजूद” है। इस अत्यंत ही सूक्ष्म व हल्केपन से भरे दिव्य भाव की मात्र कल्पना के साथ हम हिर्दय पर ध्यान करना आरम्भ करते हैं। जिससे हमारे हिर्दय में भक्ति व श्रधा का भाव उत्पन्न होने लगता है। और यह दिव्य प्रेम का भाव उत्पन्न होते ही हमारा हिर्दय हार्ट्फुल्नेस की अद्वितिय खासयित “प्राणाहुति” को अपनी ओर खींचने लगता है। मानो जब हम ध्यान के दौरान अपने हिर्दय में ईश्वर की मौन भाषा को समझने का प्रयास कर रहे होते हैं तो उसका अद्वितिय प्रेम अपना परिचय देने के लिये स्वत: ही हमारे हिर्दय में उतरने लगता है।
वस्तुत:
जब हम दिल की गहराइयों में दिव्य प्रकाश की अनुभूती की तरफ आकर्षित हो रहे होते
हैं तो हमारे हिर्दय में उत्पन्न विस्मययुक्त प्रेम से भरा
भाव स्वत: ही
ईश्वरिय प्रेम (प्राणाहुति) को अपने ओर आकर्षित करने लगता है। और हम उस दिव्य
विषयवस्तु के अभयन्तर विलीन हो जाते है। इस दिव्य भाव में डूबते ही हमारा अपने
दिमाग में उठने वाले विचारों से नाता टूट जाता है और वह स्वत: लुप्त होने लगते है।
ओर जब हम दिल की गहराइयों से वापिस लौटते हैं, तो
अवर्णनीय परम सुख हिर्दय में व्याप्त होता है जो स्वत: ही हमें अगले दिन हमारे
ध्यान-कक्ष में, हमारे निश्चित समय पर पुन: ध्यान करने
ले जाता है।
एक तरह
से हार्ट्फुल्नेस ध्यान की प्रक्रिया में हम किसी खास विषय-वस्तु को दिमाग की भाषा
यानी “सोच-विचार के द्वारा” जानने की बजाय हिर्दय की भाषा यानी “अनुभव व अहसास के द्वारा” समझने का प्रयास करते हैं। यह ज्ञान प्राप्ति का सर्वोत्त्म तरीका है।
क्योंकी तब हम अपने अर्जित ज्ञान की श्रेष्ठ्ता शब्दों से व्यक्त करने की बजाये
अपने आचरण व भावों द्वारा अभिव्यक्त करने लगते हैं, जो
अत्यंत प्रभावकारी तथा वायरल होता है।
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