Saturday, 19 December 2015

"एक साधे सब सधे सब साधे सब जाये"

अमेरिका संसार का सबसे धनी व शक्तिशाली देश हैउत्कृष्ट अर्थव्यवस्थाबेहतरीन शिक्षा व्यवस्थासर्वोतम स्वास्थ्य-सेवाऔं व संसाधनोंआदी जैसी हर तरह की सुख-सुविधा वहां के लोगों को उपलब्ध हैं परन्तु दूसरी तरफ वहाँ अत्यंत विरोधाभास व्याप्त है [UNO data of global crimes] [1] की रिपोर्ट के अनुसार अन्य देशो के अनुपात में युरोप व उतरी अमेरिका का अपराध-मान स्तर सबसे उपर है। वहां के लोग सबसे अधिक  घिनौने अपराध करते हैं। यह मानक आज की प्रचलित यथा-स्थिति के लिये एक घोर चेतावनी है। आज हर व्यक्ति दिन रात सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने की होड़ मे लगा है। हमें यह सोचना होगा कि जिन्होंने उसे पहले से ही प्राप्त कर रखा है क्या वह वास्तव में खुश है? यह आंकड़े वास्तविकता उजागर कर रहे है कि संसार के कुछ भागों में विपुल संपदासत्ता प्रभाव व ज्ञान-कुशलता की भरमार होने के बावजूद भी वहाँ शान्ती व स्थायी खुशियों का अभाव है। यही कारण है कि गौतमबुद्धसुकरातरुमीकबीरइमर्सनकार्ल जंग आदी जैसे सभी महान संत व दार्शनिक हमेंशा यही कहते आये हैं किशांति को बाहर मत तलाशोशांति तो तुम्हारे भीतर (हिर्दय में) है।” 


एक साक्षात्कार के दौरान विश्व के दूसरे सबसे धनी व्यक्ति वारेन बुफेट ने कहा, एक सीमा के बाद धन-संम्पति की प्रचुरता जीवन की उतमता के स्तर को नीचे गिराने लगती है। [2] ओर विश्व के सबसे अधिक धनी व्यक्ति बिल गेट्स ने एक दिन क्रेस्गे महाविद्ध्यालय के छात्रों व आध्यापकों को एक वार्ता देते हुये कहा, काश! मैं बहुत पहले ही गरीबी की पीड़ा से होने वाले विध्वंस के प्रति जागरूक हो पाता..., कुछ मिलियन कमाने के पश्चातहमें यह तय करना पड़ता है कि कुल मिलाकर जो इस दुनिया से लिया है उसे वापिस कैसे लौटाना है” ओर 2014 में अंतराष्ट्रिय दैनिक समाचार पत्र फाइनेशियल टाइम्स ने बिल गेट्स को इतिहास का सबसे बड़ा जन हितैषी घोषित करते हुये लिखा कि, “चैक बुक पर पेन के एक स्ट्रोक द्वारा (एक वर्ष में चार अरब डाँलर का दान देकर) बिल ग़ेट्स ने शायद किसी भी अन्य निजी व्यक्ति की तुलना में अपने साथी मनुष्यों की सबसे बड़ी सख्या की भलाई करने वाला होने का प्रभाव हासिल कर है। [3]

आखिर इस संसार में धनसंपदाप्रतिष्ठाप्रतिभा आदी सब कुछ पा लेने के बाद भी मनुष्य के मन को निरन्तर बनी रहने वाली शांति व खुशी क्यों नहीं प्राप्त होतीजबकी सहिर्दयता व दीन-दुखियों की सेवा द्वारा वह हमें सहज ही प्राप्त होने लगती है। स्वामी विवेकानन्द जी ने ठीक कहा है कि, “यह मानव जीवन हमें एक सीमित सीमा के लिये मिला है इस संसार के अभियान क्षणभंगुर हैकेवल वही जीते है जो दूसरों के लिये जीते है अन्य सभी जीवत हो कर भी मृत समान हैं।

गौतम बुद्ध ने कहा है कि जीवन पीड़ा है। विवेकानन्द जी ने इस तथ्य पर आगे प्रकाश डालते हुये कहा है कि अगर हम स्वार्थरहित हैं तो हमारी हर पीड़ा आन्नद बन सकती हैं गौतम बुद्ध ने अपने कथन को आगे स्पष्ट करते हुये कहा है कि अपने भाग्य के निर्माता हम स्वयं है।अपनी खुशी ओर पीड़ा के लिये हम स्वयं जिम्मेवार होते हैं। हम स्वयं अपने स्वर्ग अथवा नरक की रचना करते हैं।” हम देखते हैं कि अधिकतर लोग सिर्फ स्वयं के लिये जीते हैं वह अपना संम्पूर्ण जीवन केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ती में ही व्यतीत कर देते हैं। हमारी स्वार्थपरिता के कारण हम अपने प्रेम करने की असीम क्षमता से अबोधित रहते हैजिससे हम जीवन में समन्वय (सर्वथा बनी रहने वाली खुशहाली) स्थापित नहीं कर पाते। स्वामी विवेकानन्द जी के अनुसारस्वार्थी होना सबसे बड़ा दोष हैदूसरों से ज्यादा महान होने की चाहत या सबसे पहले स्वयं के बारे में सोचने से ही बुराई का सृजन होता है

वस्तुत: स्वार्थभाव से लिया गया कोई भी विचार अथवा स्वार्थभाव के साथ किया गया कोई भी कार्य करने से हममें उसके प्रति आसक्ति पैदा हो जाती है ओर हम तुरन्त उसके गुलाम बन जाते हैं। अत: हमारी इच्छायें ही हमारी उन्नती (evolution) में बाधक बनने लगती हैं। इसीलिये स्वामी जी ने सभी को सचेत करते हुये कहा है कि अपनी कल्पना में भी स्वार्थपरिता को ना आने दो। जैसे ही हम यह विचार करते हैं कि ‘मुझे वह निश्चित ही चाहिये’ पीड़ा व क्लेश आरम्भ हो जाता है।; हर चीज जिसका अधार स्वार्थ होजिसके दायें हाथ में स्पर्धा हो तथा सुख भोगना उसका लक्ष्य होउसका अभी हो या बाद में अंत निश्चित है।" स्वामी जी के अनुसार एक तरह से हर मानव की स्वार्थपरिता उसमें शैतान का अवतरण है निजस्वार्थ का हर अंश थोड़ा थोड़ा करके शैतान का रूप ले लेता है। परंतु नि:स्वार्थता ईश्वर हैजब हम एक तरफ से स्वार्थ हटाते हैं तो दूसरी तरफ से ईश्वर स्वत: प्रवेश करने लगते हैं। जब हम में से सारा स्वार्थ निकल जाता है तो सिर्फ ईश्वर ही शेष बचता है। चुंकी प्रकाश व अन्धकार दोनो एक साथ नहीं रह सकते।” [4]


हममें इच्छायें तब उत्पन्न होती है जब हम हमारे पास जो है उससे असंतुष्ट होते हैकुछ कमी महसूस करते हैं ओर जीवन से अपेक्षायें रखने लगते हैं। ओर 'जरूरत (need) तथा चाहत (want)' के मध्य का अन्तर भूल कर उन भ्रामक इच्छाऔं को अपनी जरूरत समझने लगते हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिये इतने अधिक आसक्त हो जाते है कि हमें लगने लगता है कि हम घटनाओं को नियंत्रित कर सकते हैंहम जो चाहते हैं वह हासिल कर सकते हैं। हम गलती से यह विश्वास कर बैठते हैं कि सब कुछ हमारे बस में है। परंतु हमारे किसी भी प्रियजन की आकस्मिक मृत्यु हमारी इस सोच को तबदील कर देती है। [5] 

अतएव अपेक्षा एक तरह से सर्वव्यापी ईश्वर को नियंत्रित करने की चाहत हैं। यह नादानी व अज्ञानता हमें ईश्वर से कोसों दूर (उलझनों व गहन दुखों की तरफ) ले जाती हैक्योंकी अपेकक्षाओं के तहत जब हमारी इच्छायें पूर्ण नहीं होती हैं तो हम दुखी हो जाते हैंओर जो भी हमें (ईश्वर कृपा स्वरूप) मिला है हमारी अपेक्षायें उसे अनदेखा कर हमें सदैव असंतुष्ट रखती हैंविडम्बना यह है कि अगर हमारी अपेक्षायें व इच्छायें पूर्ण हो भी जाती है तब भी उन्हें खो देने का डर हमें हर समय व्याकुल करता रहता हैक्योंकी इस परिवर्तंशील संसार की हर वस्तु से मिलने वाला आन्नद समय के साथ-साथ कम होते हुये शीघ्र ही समाप्त हो जाता है ओर हम बार-बार फिर से दुखी हो जाते हैं। अंतर्विलोकन करने पर हम यह समझ पाते हैं कि इच्छाओं के प्रति लगाव से हमारा दृष्टीकोण इतना संकीर्ण हो जाता है कि हम ईश्वर की वास्तविक सृष्टी का बोध ही नहीं कर पाते। 

अगर हम गहराई से आत्मविश्लेषण करें तो यह जान पायेंगे कि हम जीवन में दो प्रकार के कार्य करते है पहली श्रेणी के अंतर्गत वह कार्य आते हैं जिसमें (ईश्वरीय योजना के तहत) हमारे पूर्व कर्मों के भोग हमारे वर्तमान जीवन में कर्तव्यों व जिम्मेदारियों के रूप में प्रकट होते है। उन्हें अगर हम संयम व समर्पण भाव से निभाते है तो वह समाप्त हो जाते हैं। वास्तव में अपने कर्मों के प्रभाव से झूझना हमारे चरित्र के लिये सबसे अधिक शक्तिशाली चुनौती होती हैवस्तुत: जब हम अपने हर कर्म को ईश्वर की याद के साथ निभाने का प्रयास करते हैं तो हमारा चरित्र तो विकसित होता ही है उसके साथ साथ हम दैविक गुणों को भी अर्जित करने लगते हैं। तब हमारी इच्छायें परिष्कृत होने लगती हैं और उनसे उपजने वाले सभी दुखों व बुराइयों का भी अंत होने लग जाता है।


दूसरी श्रेणी के कार्य वह (अतिरिक्त) कार्य हैं जिनकी सृष्टी हम स्वयं अज्ञानतावश तब कर बैठते हैं जब हम अपनी इच्छाओं व अपेक्षाओं की पूर्ती करने की ओर उन्मुख हो जाते हैंअपनी जिम्मेदारियों व कर्मों (पूर्व जन्म के प्रभावों) को इसी जन्म में निपटा कर समाप्त करने की बजाय हम भ्रमवश उन्हीं में पुन: लिप्त हो जाते हैं। गलत फहमी में हम पूर्व प्रभावों से उत्पन्न होने वाले सम्मोहन से लगाव कर बैठते है और उसमें बंध कर नयी इच्छाओं की रचना करने लगते हैंआसक्त भाव से किया गया हर कार्य एक प्रतिक्रिया अर्थात कारण को जन्म देता हैओर हर कारण (cause) के भोग अथवा प्रभाव को समाप्त करने के लिये समय (time) की आवश्यकता पड़ती है। इसलिये अजर-अमर आत्मा को अपने विकास हेतु शरीर का  रूप धारण कर एक निश्चित समय के लिये इस मिथ्या संसार में आना पड़ता है। परन्तु प्रभाव समाप्त करने की यह प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं हो पातीक्योंकी इस संसार व उसकी वस्तुओं से लगाव होने के कारण हमारे मन में अन्य अनगिनत इच्छायें पैदा होती ही रहती है ओर इस तरह एक इच्छा की पूर्ती मरिचिका बन कर अन्य कई इच्छाओं को जन्म देती जाती है ओर हम जान ही नहीं पाते कि कब वह एक बीज से विशाल वृक्ष का रूप धारण कर लेती हैं। अतऐव हमारा जन्म-मरण का चक्र समाप्त नहीं हो पाता। जब तक एक भी इच्छा मानव हिर्दय में मौजूद रहती है उसकी आत्मा को शरीर धारण कर इस नश्वर संसार में जन्म लेना ही पड़ता है।

जीवन में चिरस्थायी आन्नद को प्राप्त करने के रहास्य को प्रकाशित करते हुये स्वामी विवेकानन्द जी ने मानवजाती को एक सशक्त संदेश देते हुये कहा है कि, “हानि, भय व त्रासदी से जितना दूर भागोगे वे उतनी तुम्हारे पीछे आयेंगी, उनका डट कर सामना करो तब वे तुम्हें छोड़ देंगीं।” ओर उनका डट कर सामना हम केवल तभी कर सकते है जब इस संसार से जुड़ी अपनी इच्छाओं के प्रति हमारा लगाव समाप्त हो जाये। क्योंकी भय व त्रासदी केवल संसारिक वस्तुओं से लगाव करने पर ही उप्पन्न होती है। अब प्रश्न यह उठता है कि यह लगाव क्यूं उत्त्पन्न होता हैतथा इससे बचने का क्या विकल्प है?

एक महान दार्शनिक ने कहा है कि मनुष्य की आत्मा एक कच्चे हीरे (क्रिस्ट्ल) के टुकड़े की भांति होती है वह उसी रंग में रंग जाती है जो उसके निकट हो। आत्मा जिसके भी संपर्क में आती है उसी की सूरत धारण कर लेती है। यही कठिनाई आत्मा के बन्धन का कारण बन जाती है। परंन्तु आत्मा जो की परमात्मा का अशं है जब स्वयं पर ध्यान करती है तो वह आत्मा की सबसे अधिक सशक्त अवस्था होती है ओर उसीमें उसका उत्थान निहित होता है। चुंकी जब हम आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिये अपने हिर्दय पर ध्यान करते हैं तब हम अपने वास्तविक दिव्य स्वभाव से परिचित होने लगतें है। [6] 

वस्तुत: जब हम अपने हिर्दय में मौजूद दिव्य प्रकाश के स्त्रोत पर ध्यान का नियमित अभ्यास करते हैं तो हमारे हिर्दय का अन्धकार व अज्ञानता पूर्णत: मिट जाती है। दिव्य प्रकाश की सहज परिकल्पना मात्र से ही उत्क़ृष्ट हिर्दय के सभी वास्तविक रहास्य उजागर होने लगते हैं। हिर्दय में उपस्थित एकत्व भाव भीतर से बाहर प्रकाशित होने लगता है जिससे जीवन के सभी द्वैत समाप्त हो जाते हैं। परिणामस्वरूप जीवन हमें जो कुछ भी पेश करता है उसके प्रति हम (हम बिना विचलित हुये) उचित ढंग से अनुक्रिया (respond) करते हैं। विषम परिस्थितियों में भी हम शांत व स्थिर रहते हुये प्रेम की अवस्था बनाये रखते हैं। यह दशा दिव्य अवस्था के नाम से परिभाषित की जाती हैं[7]  भागवद गीता में श्री कृष्ण ने इसी अवस्था को “स्थितप्रज्ञा” कहा है 
  
आन्नद व शांति पाने के लिये लोग व्यर्थ ही भिन्न भिन्न बाहरी साधन अपनाते हैं आन्नद व शांति पाने के लिये लोग व्यर्थ ही भिन्न भिन्न बाहरी साधन अपनाते हैं क्योंकी जीवन में शान्तीसंतुलन व समन्वय केवल तभी स्थापित होता है जब हम अंतर्मुखी हो जायें। वस्तुत: हमारे मन की दो वृतियां होती हैंअधोमुखी तथा उर्ध्वमुखी अर्थात एक विविधता या संसारिकता की और निर्देशित ओर दूसरी एकत्व या आध्यात्मिक्ता की ओर निर्देशित। संतुलित जीवन के लिये इनके बीच उचित तालमेल होना अति आवश्यक है। ध्यान द्वारा हम अपनी अधोमुखी वृतियों को उर्ध्वमुखी कर सकते हैं। ध्यान के लम्बें अभ्यास द्वारा हमारे मन व इन्द्रियों में उचित संयम और अनुशासन स्थापित होने लगता है। जिससे वह हिर्दय की आन्तरिक (दिव्य) अवस्था का प्रभाव ग्रहण करने लगते हैं। ओर जिससे ईश्वर से निकटता की धारणा प्रधान हो जाती है। परिणाम स्वरूप हम हर कार्य ईश्वर के सतत स्मरण में रहते हुये करने लगते हैं। ईश्वर के प्रति प्रेम व भक्ति से भरा हमारा ध्यान बहिर्मुखी (झूठी मोह-माया में लिप्त) मन को जीवन के वास्तविक व उच्च्तम लक्ष्य (दिव्य प्रेम) की तरफ उन्मुख कर देता है। तब उस व्यक्ति का स्वभाव व जीवन के प्रति दृष्टीकोण सब बदल कर सर्वोत्तम स्तर तक उठने लगता है। वह स्वयं की निम्न इच्छाओं को भूल कर ईश्वर का प्रेम पाने के लिये ईश्वर से प्रेम करने लगता है। वह मिथ्या को त्याग कर वास्तविक्ता को स्विकारने लगता हैवह भूत व भविष्य भूल कर सदा वर्तमान में रहते हुये शाश्वत्ता में जीने लगता है।। 

जैसेकी एक प्रसिद्द कहावत है कि ‘हम वही बन जाते है जिससे हम प्रेम करते है। ओर जब हम जीवन की भ्रमिक वस्तुओं से ध्यान हटा कर केवल अटल सत्य की ओर ध्यान केन्द्रित करते हैंनश्वर चीजों से प्रेम करना छोड़ कर सर्वव्यापी ईश्वर (जो स्वयं प्रेम है) से प्रेम करने लगते हैं तो हम भी प्रेम बन जाते है। तब हर कण में हम ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने लगते हैं। और वह एकत्व भाव हमारे जीवन को असीम आन्नद से भर देता है।

 संत कबीरदास जी के शब्दो में: 
जिन ढूंडा तिन पायागहरे पानी पैठ
 मैं बोरी डूबन डरीरही किनारे बैठ

अर्थात जो भी पानी की गहराई में उतर कर मोती ढूंढ्ने का प्रयास करता है केवल उसे ही खजाने की प्राप्ती होती है। अतएव जो ध्यान द्वारा हिर्दय की गहरायी में उतरने का प्रयास करता है वह निश्चित रूप से ईश्वर को प्राप्त करता है। परन्तु जो अज्ञानतावश ऐसा करने से डरता है अथवा कतराता है वह ध्यान द्वारा प्रकट होने वाले हिर्दय में मौजूद परम सत्ता की और जाने वाले मार्ग से अवगत नहीं हो पाता तथा उस राह से प्राप्त होने वाली आत्मोनन्ती व उससे जनित परमान्न्द को प्राप्त करने से भी वंचित रह जाता है।

संत रहीम जी के अनुसार:
एके साधे सब सधे.. सब साधे सब जाय,
रहिमन मुलाहि सींचिये फूलहि फलहि अघाय

भारतीय विचारधारा के अंतर्गत धर्मअर्थकामव मोक्ष यह चारों पुरुषार्थ प्राप्त करने पर ही मानव जीवन अर्थपूर्ण व सफल माना जाता है। धर्म का अर्थ (सत्यपवित्रता व मर्यादा जैसे) उन शाश्वत नियमों का पालन करना है जिसमें ईश्वर की सृष्टी के सभी अंगों का समुचित विकास हो सके। अर्थ अर्थात धन जो वस्तुत: जीवन के कर्तव्यों को मर्यादा के साथ पूरा करने का साधन है। परंतु यह सदा ध्यान रखना चाहिये कि कमाई धर्म के रास्ते से होअधर्म के रास्ते से नहीं। काम वास्तविकता व मिथ्या (माया) के मध्य का भेद समझ कर वास्तविकता के अधार पर पवित्रता के साथ कार्य करने की काबलियत है। तथा मोक्ष का अर्थ है आत्मज्ञान प्राप्त कर जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाना। इसे आत्मा का परमात्मा में विलय हो जाना अथवा आत्मा व तत्व का पूर्ण पृथक्करण भी कहते है। परंतु सत्य यह है कि अगर प्रथम तीन पुरुषार्थ की बजाय हम केवल मोक्ष प्राप्ती की और ध्यान दे तो उसके साथ साथ अन्य तीन स्वत: ही परिष्कृत हो कर उन्नत होने लगते हैं। वस्तुत: अन्य तीनो पुरुषार्थ केवल उस सीमा तक वाछंनिय हैं जहां तक वह मोक्ष प्राप्ति में सहायक हों। रहीम जी के अनुसार मोक्ष प्राप्ती जो मानव जीवन का मूल (मुख्य उदेश्य) हैकेवल उसे सींचते रहने से अन्य तीनों पुरूषार्थ स्वत: ही फलने फूलने लगते हैं। मोक्ष को सुचारू रूप से साधने से अन्य तीनों स्वयम ही सध जाते हैंपरन्तु अन्य पुरूषार्थों को साधने पर हम अंत में चारों को खो बैठते हैं।
                                  
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FOOTNOTES:
1) Top ten countries with highest crime rate in 2014: http://top10for.com
2)  An exclusive interview with Bill Gates by Richard Walters
FT Magazine: http://www.ft.com
3)  How Warren Buffet Found the Key to Happiness: http://psychcentral.com/blog/archives/2014
4) The Sages of India by Swami Vivekananda:  https://en.wikisource.org/wiki/The_Complete_Works_of_Swami_Vivekananda/Volume_3/Lectures_from_Colombo_to_Almora/The_Sages_of_India
5) How I found God? By Dr. Ichak Adizes
http://www.ichakadizes.com/how-i-found-god/
6) Meditation by Swami Vivekananda: http://www.vivekananda.net/Lectures/Meditation.html
7) Heartfulness is Lovefulness’ - Experience the Beauty of the Heart at Heartfulness: http://www.heartfulness.org