पूजनिय
स्वामी विवेकनन्द जी ने कहा है कि, “हमारी नैतिक प्रकृति
जितनी उन्नत होती है, उतना ही उच्च हमारा प्रत्यक्ष
अनुभव होता है, और उतनी हमारी इच्छा शक्ति अधिक बलवती
होती है।"
एक नन्हा सा, सात-आठ महीने का बालक जब इस दुनिया को अपनी
मासुमियत के साथ देखना आरम्भ करता है तो उसे हर चीज सलौनी व खूबसूरत लगती है। वह
किसी भी चीज को देखता है तो बड़ी उत्सुकता से उसकी और घुटनों के बल दौड़ता हुआ
जाता है ओर उसे उठा कर खाने लगता हैं। वो हर शै से इतनी महोब्ब्त करता है कि उससे एकाकार करने हेतु, उसे खाने का प्रयास करता है, उसे अपने भीतर ले
जा कर दो से एक होने का प्रयास करता है। चाहे वह मिट्टी हो या
पत्थर, खिलौना हो या जूता, हर
शै को बिना किसी भेदभाव के बस एक ही प्रेम से भरी नजर से देखता है। वह अपने हाथ
में पकड़ी शै से अलग नहीं होना चाहता; क्षण भर में
ही वह उसे इतनी प्रिय लगने लगती है कि अगर कोई उससे वह चीज लेने का प्रयास करता है तो वह उससे बिछुड़ने के
अहसास भर से ही रोने लगता है। वह अच्छा है या गन्दा, साफ
है या मैला, महंगा है या सस्ता, अथवा सही है या गलत, बिना किसी सरोकार के
उसके भीतर भरी निरपेक्ष मासूमियत ओर पवित्रता बाहर की हर शै में केवल प्रेम से ही
विषय-प्रवेश करती है।
अपने भीतर बसे प्रेम की वजह से वह बाहर की हर
चीज से अलग होने के बावजूद भी जुड़ा रहता है। ओर उसकी यह अबोधता सभी को अपनी ओर
आकर्षित करती है। यह उसकी अबोधता ही है जो उसकी माँ को सदैव उससे बाधें रखती है।
उसके साथ किलौल करते समय उसकी अबोधता व पवित्रता बड़ों को भी उन क्षणों में उस जैसा बनने के लिये
आवेशित कर देती है। एक नन्हा बालक अपनी बलहीन सरलता से बड़ी आसानी से सबके दिलों में प्रवेश
पा लेता है।
परन्तु ना
जाने क्यूं बड़े हो जाने पर हम यह सरलता खो देते हैं, उम्र के बड़ने के साथ साथ यह सरलता बड़ने की बजाये धुन्धली पड़ने लगती है।
उम्र के बड़ाव के संग दिव्य निर्मलता का भी उत्थान हो ऐसा जीवंत उदाहण आज के युग
में मिलना अत्यंत दुर्लभ हो गया है। परंतु “श्री राम
चन्द्र मिशन” (www.srcm.org) के उत्कृष्ठ गुरूओं की
श्रिंख़ला के सभी गुरू सदैव ही इन दैविक सदगुणों की जीवंत मिसाल रहे हैं। सहज मार्ग का नियमित
अभ्यास करने वाले हम सभी अभ्यासियों ने बड़े सौभाग्य से ‘सहज मार्ग संस्था’ के सभी गुरूओं में, एक वीर सिपाही सी कर्मठ्ता के साथ साथ, बालक सी
निर्मलता, पवित्रता, व
अनपेक्ष प्रेम जैसे गुणों की मौजूदगी के दुर्लभ सुकून को सदैव अपने ह्रदयों में
महसूस किया है और उसके साथ साथ अपने भीतरी विकास के अनुपात में उसे अपने जीवन में उतारने का देवयोग भी
अर्जित किया है।
हर नन्हा
बालक प्राकृति के समरूप अवस्था में होता है वह इस बात का प्रमाण देता है कि
सृष्टीकर्ता ने प्रेमवश हमें कितनी खूबसूरती से रचा है; ओर
आज हमारी अवस्था में जो भी क्षति व पतन हुआ है उसका सर्जन केवल हमने किया है, क्योंकी आज मानव जाति यह भूल गयी है कि ईश्वर से अविरत प्रेम ही मानव जीवन
का सर्वोपरि प्रथम कर्तव्य है।
स्वामी
विवेकानन्द जी ने संम्पूर्ण मानव जाति को दिव्य संदेश देते हुये कहा है, “मजबूती के साथ खड़े हो जाओ, ओर प्रेम के पात्र
ईश्वर को चाहो। परमात्मा के प्रति प्रेम व समर्पण मन को शुद्ध कर देता है। ‘ईश्वर भक्ति’ सर्वोच्च शक्ति है; मन को शुद्ध करने के लिये यह अकेले ही पर्याप्त है। पवित्रता के बल से
उच्चतर, और कौन सा बल है!!; प्यार ओर पवित्रता तो समपूर्ण जगत पर शासन करते है।” जीवन को सुगम बनाने वाली इस अवस्था को प्राप्त करने की सहुलियत पर प्रकाश
डालते हुये उन्होने आगे कहा है, “जब तक तुम्हारे हृदय में (i) उत्साह, एवं (ii) गुरू तथा (iii) ईश्वर में विश्वास -- ये तीनों
वस्तुएँ रहेंगी -- तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता। मैं दिनोंदिन अपने हृदय
में शक्ति के विकास का अनुभव कर रहा हूँ। हे साहसी बालकों, कार्य करते रहो।”
आओ हम सब
उस पवित्रता से पूर्ण निर्मल अवस्था को पुन: व शीघ्र प्राप्त करने हेतु अपने
हिर्दयों को ईश्वर की अविरत अराधान से जोड़ लें तथा उसकी कृपास्वरूप मिले परम
पूजनिय पुरूषोतत्म कल्याणपुरूष, हमारे गुरुदेव के प्रेम
व अनुराग में स्वयं को इस तरह से समर्पित कर दें जैसे एक नन्हा मासूम
बालक स्वयं को पूरी निर्भरता के साथ अपनी माँ को समर्पित करता है। चूकीं सर्वभौमिक उत्त्थान
केवल ओर केवल हर व्यक्ति के स्वयं के उत्थान पर निर्भर करता है, अत: इस मूलभूत दायित्व को पूर्ण गंम्भीरता से निभाना हर मानव का परम धर्म
है।
इस अपरिहार्य उत्थान हेतु आओ हम अविभाजित दृढ़ प्रतिबद्धता के साथ अपने भीतर बालक सी
अबोधता भर लें तथा
बालक सी पवित्रता के साथ अग्रगमन करते हुये स्वय़ं प्रेम बन कर शीघ्रत्म से
शीघ्रतम इसी जन्म में ईश्वर से एकाकार का लक्ष्य हासिल कर लें।
कहते है, जो मजा बालक होने की अवस्था में है वह आन्नद जीवन की किसी अन्य अवस्था में
नहीं है। हमारे
भीतर विकसित हुयी नन्हें बालक सी निर्मलता, ईश्वर को
हमारी ओर आकर्षित करती है तथा हमारे परमपिता परमात्मा व अपनी “गुरू रूपी
माँ” के प्रति समर्पण हमें उसकी कृपा व प्रेम रूपी गोद
में खेलने का अधिकार प्रदान करता है। स्वामी विवेकनन्द जी के कथनानुसार, “गम्भीरता के साथ शिशु
सरलता को मिलाओ।" केवल वह नन्हें बालक सी “अबोधता, पवित्रता, प्रेम व समर्पण” ही है जो हमें उसकी अनुपम गोद यानी, “जीवन का सबसे
सुरक्षित व सर्वोत्कृष्ठ सुकून” में रहने के आन्नद से
अभिभूत करवाती है। बालक सी सरलता की सुभीता (सुख) व अहमियत के भाव को एक कवि ने पंक्तिबद्ध
करते हुये कहा है, “बड़ा हो जाने पर तो माँ भी गोद से उतार
देती है।"

