हे मेरे परमेशवर
तुम प्रकाश हो और मैं अन्धकार
मैं तुम्हारी ओर आना चाहता हूं।
तुम्हारा आकर्षण
मुझे बार-बार
तुम्हारी और खींचता है परंतु...
मैं जब भी तुम्हारी और
देखता हूं
तो तुम्हारे औजस्व
की
तीव्र चमक की चौंध से
मेरी आंखे बन्द
हो जाती हैं,
और मैं तुम्हें देख ही नहीं पाता हूं।
मैने कई प्रयास
किये
कि मैं भी उस अदभुत सौन्दर्य,
उस दिव्य सी दमक को पा
लूं
मैं कई उंचाईयों तक चढ़ा भी
पर तुम हमेंशा
आसमान की तरह
मुझसे बहुत उंचे थे....
मैं थोड़ा थक गया
हूं,
निराश भी हुं,
थोड़ा अकेला और उदास भी हूं
आखिर तुम तक कैसे
पहुँचू?
तुम्हें कैसे पांऊ ...!!
हे मेरे खुदा
कोई तो खुदा का बंदा भेज
जो तुझ तक जाने
की
राह जानता हो,
वह जो मुझे और
मेरी कमजोरियों को समझ सके
और मुझे तुम,
तुम्हारे सौंन्दर्य तक,
तुम्हारे औजस्व तक.....
मेरी बन्द आखों
में ही,
मेरा हाथ थाम कर...
तुम तक ले चल सके।
मुझे वो दिव्य
चक्षु दो ताकि
मैं उस दिव्य मानव को पहचान सकूँ!
ओर उसके पीछे
चलते चलते तुम तक,
मेरे दिव्य आंन्नद
के अनन्त सागर तक,
मेरे परमान्नंदधाम को
पा सकूँ।
हे मेरे प्रभु, मेरे
नाथ,
यही मेरी तुमसे प्रार्थना
है।
मैं जानता हूँ
कि यह इतना आसान नहीं होगा,
पर मैं तुम्हारी ही
संतान हूं।
मेरी चाहत केवल
तुम्हीं हो सकते हो....
इससे कम मुझे और
कुछ भी नहीं चाहिये।
हे मेरे
कृष्ण! जन्मदिन मुबारक हो!