Friday, 21 November 2014

य़ह यथास्थिति बदल कर एक नयी छवी बनानी है

 यथास्थिति (Status-Quo)

क्यूं चरित्र सीता का भी
सदा दाव पर ही रहता है;
अग्नि परिक्षायें दे कर भी
घाव वहीं रहता है ॥

उद्धरित होती जिससे
दया, ममता व परोपकार
सेवा और समर्पण
जिसके जीवन का आधार
हर पल करे संचारित जो
सहिष्णुता और प्यार
अबला हो कर भी बने वो 
शक्ति का अवतार

 बन जाती सदा मूरत जो
विशुद्ध परम त्याग की,
निर्मल शील सूरत
दिव्यता के अनुराग की
फिर है ये कैसी विडम्बना
नैतिकता के विरोधाभास की
रहे सदा ही आँच में
पवित्रता उसके साख की ॥

क्यों उसे अपनी गरिमा का
अधिकार नहीं मिलता
जीवंत मिसाल बन कर भी
सत्कार नहीं मिलता
शुचिता का मापदण्ड हो या
गैरत की मचान
क्यों उसके प्रत्यक्ष आचरण
व्यवहार से भी सबको
उसके सतीत्व का
परिज्ञान नहीं मिलता ॥

जो करती है चरित्र निर्माण
अपने परिवार और समाज का
क्यों उसे अपने ही चरित्र का
इख्तियार नहीं मिलता ॥

युगों युगों से बस
यही उसकी कहानी है ।
हर सोच से अब
यह गन्दगी मिटानी है ।
नारी पत्नी से कहीं ज्यादा
बहन, बेटी माँ है ।
पवित्रता, ममता चरित्रता की
वो ही तो बागबाँ है ॥

अब भक्ति के संचार से
य़ह यथास्थिति मिटानी है ।
दिव्यता के प्रसार से
एक फसल नयी उगानी है ॥
वात्सल्यता के सागर से
एक नयी छवि बनानी है;
हर ह्रदय में नारी से पहले
एक माँ बसानी है

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