परमात्मा की प्रेमभरी पुकार
बेसब्र हो कर मैं कर रहा इंतजार,
तुम कब लौटोगे,
दिया जीवन तुम्हें उपहार...
के तुम अब लौटोगे।
कुएं का मैडक बन कर
न भटको अन्धकार में तुम,
संघर्षो से झूझ कर पढ़ो पाठ...
तुम तब लौटोगे।
क्यों भूल जाते हो असली मकसद,
मुझमें मिलने का,
सुनों आत्मा की हर बात...
तो तुम तब लौटोगे।
शरीर से ज्यादा तुम
आत्मा की... कब सोचोगे
ढूंढो दिव्य गुरू सी कोई नाव
के तुम तब लौटोगे।
जीवन कुछ ओर नहीं
मुझे पाने का खेल है ये,
हर बूंद का सत्य के सागर से
पुन: मेल है ये।
मैं सागर कब से अपनी
बिछुड़ी बूंदों को निहारता हुं,
दुखों को भेज कर मैं
तुम्हें पुकारता हूं....
स्विकारो हर मुश्किल हालात,
तुम तब लौटोगे,
समय हो रहा बरबाद....
तुम कब लौटोगे!
यह बहुमुल्य जीवन,
‘खुदा’ सा बनने का एक मौका है,
सिर्फ पूर्व धारणाओं ने तुम्हे
भीतर जाने से रोका है।
तेरे भीतर से ही इक राह
मुझ तक आती है,
दिव्य गुरू से करो प्रेम तो
वो नजर आती है।
करो भीतर अब तुम ध्यान,
तेरे दिल में बसा हर ज्ञान
करो पवित्र सभी आचार...
तुम तब लौटोगे....
तेरी आत्मा की मै हूं प्यास,
कब होगा तुम्हें आभास,
जरा दिल से करो अहसास,
तुम तब लौटोगे....
जीवन दिया उपहार
कि तुम अब लौटोगे
मै देख रहा हूं बाट...
के तुम अब लौटौगे...
के बस अब लौटोगे!!
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