क्या बताउँ कौन हुं मैं,
मौन हो तुम और मौन हुं मैं
शब्द! सिर्फ दिवार बनाते हैं,
तुम कौन, मैं कौन,
बस यही बताते हैं,
विचार जब खामोश हो जाते हैं,
तो शब्द भी उसके आगोश में
सो जाते हैं।
तब खामोशी के गर्भ से
कोई हमसे कहता है,
"उससे महोब्बत करो
जो
सबके दिल में रहता है"।
‘दिव्य महोब्ब्त’
एक असीमित सुकून है|
यह मानव का
सबसे सुरक्षित कुकुन है।
जब मानव की खुदा से
महोब्बत गहराती हैं
शब्दों ओर विचारों में
बस मंजिल समाती है।
चुंकी, मानव ओर कुछ नहीं,
बस खुदा का ही एक अंश है,
असलियत से बिछुड़ा
एक अपभ्रशं है।
अब वापिस विलय की खातिर
वो अपनी हर गन्दगी बुहारता हैं,
उसकी हर रजा को
बड़े प्रेम से स्विकारता है।
दूरी अब क्यों है
उसको इस कदर तड़फाती है,
कि उसकी दिव्य प्रेम की बाड़
विश्व प्रेम सागर में समा जाती है।
हल्केपन से हिर्दय
भर जाता है;
रहीम राम ओर
राम रहीम हो जाता है...
अब उसके, मेरे
और तेरे मौन में
सिर्फ खुदा मुस्कुराता है...
सिर्फ खुदा मुस्कुराता है।
*************
क्या बताउँ कौन हुं मैं,
मौन हो तुम और मौन हुं मैं
शब्द! सिर्फ दिवार बनाते हैं,
तुम कौन, मैं कौन,
बस यही बताते हैं,
विचार जब खामोश हो जाते हैं,
तो शब्द भी उसके आगोश में
सो जाते हैं।
तब खामोशी के गर्भ से
कोई हमसे कहता है,
"उससे महोब्बत करो
जो
सबके दिल में रहता है"।
‘दिव्य महोब्ब्त’
एक असीमित सुकून है|
यह मानव का
सबसे सुरक्षित कुकुन है।
जब मानव की खुदा से
महोब्बत गहराती हैं
शब्दों ओर विचारों में
बस मंजिल समाती है।
चुंकी, मानव ओर कुछ नहीं,
बस खुदा का ही एक अंश है,
असलियत से बिछुड़ा
एक अपभ्रशं है।
अब वापिस विलय की खातिर
वो अपनी हर गन्दगी बुहारता हैं,
उसकी हर रजा को
बड़े प्रेम से स्विकारता है।
दूरी अब क्यों है
उसको इस कदर तड़फाती है,
कि उसकी दिव्य प्रेम की बाड़
विश्व प्रेम सागर में समा जाती है।
हल्केपन से हिर्दय
भर जाता है;
रहीम राम ओर
राम रहीम हो जाता है...
अब उसके, मेरे
और तेरे मौन में
सिर्फ खुदा मुस्कुराता है...
सिर्फ खुदा मुस्कुराता है।
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